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आसान नहीं रहा इस लौह महिला के जीवन का सामाजिक सफर:-

दिनांक -26।10।2018

 

गाज़ीपुर।नेक इरादा दिल में जज्बा बेहतरीन कार्य शैली परिवार की जिम्मेदारी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा और नित्य प्रतिदिन मजबूर लोगों की मदद ,हां इस तरह की बातें किसी कहानी या उपन्यास में नहीं यह हकीकत है और यह सब कर दिया एक ऐसी महिला अगर हम महिला कहे तो यह शब्द इन व्यक्तित्व के लिए उचित नहीं होगा ये लौह महिला के लिए, मतलब “आयरन लेडी” आईये प्रकाश डालते हैं – औरत जब यह शब्द आता है तो समाज को लगता है कि अपने में दबा कुचला और शोषण का शिकार अगर कोई व्यक्तित्व है तो उस व्यक्तित्व का नाम है औरत, लेकिन समय बदला चीजें बदली और वर्तमान परिवेश में 70 के दशक से संस्कार लेकर 21 वी शताब्दी के आधुनिक युग में उस संस्कार को बरकरार रखना अपने आप में एक चुनौती थी सफर शुरू हुआ उस लौह महिला का जन्म बलिया में ,पढ़ाई की शुरूआत कलकत्ता से हुई,बहुत ही साधारण परिवार में पैदा होने के बाद चुनौती बहुत थी लेकिन जिनका आदर्श लक्ष्मी बाई हो व जिनके रक्त में दादा का स्वतंत्रता सेनानी वाला जोश जज्बा हो तो हौसला कम कैसे होगा बनारस के काशी विद्यापीठ से पढ़ाई पूरी होने के बाद वह भी”राजनीति शास्त्र” में वही घर की एक बड़ी जिम्मेदारी बच्चो का पालन पोषण ससुराल से लेकर माँ के भूमिका तक का एक कठिन परिवारिक सफर जिम्मेदारी थी तीन बेटियों व एक बेटे की जहां शिक्षा दीक्षा के साथ विवाह आदि का ख्याल के साथ उनके भविष्य की चिंता,तथा परिवार के साथ साथ समाज और खुद के कुछ सपने ,लेकिन सपने कुछ अलग थे कुछ करने के लिए वह भी शुरुआत ही राष्ट्रसेविक समिति के विचारधारा से धीरे-धीरे जिम्मेदारी बढ़ती गई मुश्किलें भी बीच में आती गई एक तरफ परिवार दूसरी तरफ समाज ,शक्ति की स्वरूपा दुर्गा ने मोर्चा तो संभाला ही और राजनीति में शक्ति के संतुलन के सिद्धांत को लेकर परिवार समाज और राजनीति की बड़ी जिम्मेदारी अपने हिस्से में ले ली ,परिवार का पालन भी हुआ समाज में नारियों को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा,स्वावलम्बन प्रकाशन ,नारी सशक्तिकरण , के साथ रामजन्मभूमि आंदोलन,स्वदेशी जागरण मंच ,जैसे मंचों पर जाकर देशभक्ति और राष्ट्र की भावना से ओतप्रोत होकर समाज को खड़ा करने की कोशिश भी की गई वहीं दूसरी तरफ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अलख जगाते हुए साहित्य प्रकाशन की प्रदेश की एक बड़ी जिम्मेदारी को संभालने के लिए इस महिला ने एक बड़ा कदम रखा और तो और साथ ही नारी जागरण नामक पत्रिका का प्रकाशन कर नारियों के अंदर आत्मसम्मान की भावनाओं को आत्मबल देने का कार्य भी किया लेकिन अभी नियति में कुछ और था जैसे-जैसे समय बढ़ता गया काम बढ़ता गया सामाजिक जिम्मेदारी पर जिम्मेदारी भी बढ़ती गई और आखिर वह दिन आ ही गया जब 2018 में राज्यमहिला आयोग up के द्वारा सदस्य के रूप में इन शख्सियत की नियुक्ति हुई ,महिला आयोग की सदस्य बनकर मीना चौबे जी ने आखिर यह बता दिया कर्म और भाग्य तभी एक दूसरे का संबंध बनाती है जब कर्म करते रहिए तभी भाग्य साथ देता है मीना चौबे जी की लगन परिश्रम और ईमानदारी का फल आज यह है कि महिलाओं में उनकी लोकप्रियता चरम पर है और जिस जिले में जाती हैं वहां शोषित महिलाओं के सम्मान और उनके आत्मबल के लिए एक दीपक की तरह उन्हें रोशनी देने का काम आज यह कर रही है!!

शैलेंद्र कवि की कलम से

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